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Side Effects Of Watching Reels: गाजियाबाद के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. कदम नागपाल ने रील्स देखने की लत को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है. ज्यादा स्क्रीन टाइम से याददाश्त कमजोर होना, एकाग्रता की कमी, एंजायटी, OCD और स्लीप डिसऑर्डर जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं. बच्चों में बढ़ते चिड़चिड़ेपन और मानसिक रोगों से बचाव के लिए विशेषज्ञ ने डिजिटल डिटॉक्स और ऑफलाइन गतिविधियों को बढ़ाने की सलाह दी है.
गाजियाबाद: आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन बच्चों के लिए खिलौना और बड़ों के लिए समय बिताने (काटने) का सबसे आसान जरिया बन चुका है. जहां बच्चे ऑनलाइन क्लास, गेम्स और रील्स में उलझे हैं, वहीं वयस्क खाली समय में घंटों सोशल मीडिया स्क्रॉल कर रहे हैं. हालात ऐसे हो गए हैं कि उम्र चाहे कोई भी हो, मोबाइल से दूरी बनाना मुश्किल होता जा रहा है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि लगातार छोटी वीडियो क्लिप्स यानी रील्स देखना आपके दिमाग पर क्या असर डाल रहा है? विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदत भले ही सीधे ‘ब्रेन डैमेज’ न करे, लेकिन इसके खतरे बेहद गंभीर हैं.
सीधा ब्रेन डैमेज नहीं, लेकिन खतरा जरूर
गाजियाबाद के इंदिरापुरम स्थित यशोदा मेडिसिटी के प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. कदम नागपाल बताते हैं कि सोशल मीडिया का प्रभाव हर उम्र के व्यक्ति पर तेजी से बढ़ा है. लोग जैसे ही खाली होते हैं, तुरंत मोबाइल उठाकर रील्स देखने लगते हैं. कई लोग बिना रुके घंटों तक शॉर्ट वीडियो देखते रहते हैं और यह नहीं सोचते कि इसका असर उनके दिमाग और व्यवहार पर क्या पड़ रहा है.
एकाग्रता और याददाश्त पर गहरा असर
डॉ. नागपाल के अनुसार, ‘जरूरत से ज्यादा रील्स देखने से दिमाग की एकाग्रता (Concentration) धीरे-धीरे कम होने लगती है. व्यक्ति किसी एक काम पर लंबे समय तक ध्यान नहीं लगा पाता और उसकी याददाश्त कमजोर होने लगती है.’ सोशल मीडिया का असर खासतौर पर बच्चों की पढ़ाई पर साफ दिखाई देता है. उनका किताबों में मन नहीं लगता और मोबाइल देखने की आदत बन जाती है.
FOMO और OCD का शिकार हो रही युवा पीढ़ी
डॉ. नागपाल ने चेतावनी दी है कि, एंजायटी (Anxiety) फोन पास न होने पर बेचैनी होना कि कहीं कोई अपडेट मिस न हो जाए. FOMO (Fear of Missing Out) दूसरों की लाइफस्टाइल देखकर खुद को कमतर आंकना और हर पल ऑनलाइन रहने का दबाव महसूस करना. OCD (Obsessive Compulsive Disorder) यह आदत आगे चलकर गंभीर मानसिक विकार का रूप ले सकती है.
बच्चों के व्यवहार में आ रहा चिड़चिड़ापन
ज्यादा स्क्रीन टाइम वाले बच्चों में डिप्रेशन, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार देखा जा रहा है. मोबाइल छीनने या मना करने पर बच्चे चिल्लाने या गुस्सा करने लगते हैं. न्यूरोलॉजिकल प्रभाव की बात करें तो लंबे समय तक स्क्रीन देखने से सिरदर्द और स्लीप डिसऑर्डर (नींद की कमी) की समस्या आम हो गई है. नींद पूरी न होने से दिमाग को आवश्यक आराम नहीं मिल पाता, जिससे गंभीर मामलों में दौरे (Seizures) जैसी समस्याएं भी सामने आ सकती हैं.
जानें कैसे करें बचाव?
डॉ. कदम नागपाल का सुझाव है कि अब समय आ गया है कि हम डिजिटल दुनिया से थोड़ा ब्रेक लें. उन्होंने कहा कि कोरोना काल के बाद ऑनलाइन क्लासेज के चलते बच्चों में मोबाइल और लैपटॉप का इस्तेमाल बहुत बढ़ गया है. अब जरूरत है कि पढ़ाई की प्रक्रिया फिर से ऑफलाइन की ओर लौटे. माता-पिता को खासतौर पर प्राइमरी स्कूल के बच्चों को मोबाइल से दूर रखना चाहिए. पढ़ाई में मदद के लिए टीवी जैसे विकल्प बेहतर हो सकते हैं.
डॉक्टरों की सलाह है कि सिर्फ बच्चों ही नहीं, बड़ों को भी अपने स्क्रीन टाइम पर नियंत्रण रखना चाहिए. काम के लिए स्क्रीन जरूरी है, लेकिन सोशल मीडिया और रील्स के लिए नहीं. बीच-बीच में ब्रेक लें, मोबाइल से दूरी बनाएं और दिमाग को आराम दें.